एक दिया तो दिल से जलाओ यारों ,
उधार की रौशनी से घर रौशन नहीं होते !!
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खुशियां बाँटने वाले कहाँ होते हैं गरीब ,
मुफ़लिसी दिल की होती है , दौलत की नहीं !!
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मन के अंधेरों को दूर भगाएं ,
आओ कुछ ऐसे दीप जलाएं ,
जहाँ में रोते हुए बच्चों को हसाँयें ,
आओ कुछ ऐसे दीप जलायें ,
जाति धर्म की दीवार गिराएं
आओ कुछ ऐसे दीप जलाएं ,
आदमी को अब इंसान बनायें ,
आओ कुछ ऐसे दीप जलाएं !!
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जगमगाती बत्तियों के शहर से
लौट रहा था वो बूढ़ा कुम्हार
बेच कर अपनी हसरतों के दिए
धुंधलाये पगडंडियों में खोजता
अपने क़दमों के निशान
जाना था उसे वहीँ
जो था उसका गाँव
वही गाँव जो न दे सका
उसे उन दीयों का मोल
पर कभी तो ऐसा होगा
जब नहीं देखना होगा उसे
पेट की आग के लिए शहर की ओर
तब उन दीयों में होगी
उम्मीद और मुस्कुराहटों की रौशनी !!
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इंतज़ार के लम्हे हों या चंद पल का साथ ,
गुज़र जाते हैं , गिला क्या करें ,
वक़्त को मुट्ठी में क़ैद करना आया नहीं ,
काश इन लम्हों को कोई जुदा न करे !!
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वो शामें भी क्या खूब होती हैं ,
जब तुम खुल कर मुस्कुराते हो ,
मुद्दतें बीत गयीं अब तो ,
अब तो सिर्फ ख्वाबों में आते हो !!
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जिन गलियों में गुजरा था अपना बचपन ,
वहां की धूप अब भी गुनगुनी सी लगती है ,
न जाने कहाँ कहाँ से आती हैं आवाजें ,
पर वो सारी धुनें सुनी सुनी सी लगती हैं !!
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मौसम भी क्या खूब रंग दिखाता है ,
कभी धूप , कभी बारिश और कभी ठण्ड ,
पल भर में ये बदल जाता है ,
कभी ये था अपने निश्चित परिधि में ,
अब ये इंसानों से ढंग दिखाता है ,
कितनी चतुराई आ गयी है इसमें ,
बाघ और बकरी को संग दिखाता है !!
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ये चेहरे भी क्या क्या सितम ढाते हैं ,
खुद को तो दिखते नहीं , औरों को क्यूँ भाते हैं !!
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चलते रहे सफ़र में , कभी सोचा ही नहीं ,
पहुचेंगे गर मुक़ाम पे तो हासिल क्या होगा !!
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हम तो समझे थे ,
हवाएँ खामोश नहीं होतीं ,
लेकिन इन सन्नाटों को देखकर ,
अब महसूस होने लगा है कि ,
वक़्त बेवक़्त चलने वालीं हवाएँ ,
कभी कभी ख़ामोशी की शक्ल में ,
आने वाले तूफान की आहट दे देती हैं !!
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तुम तो जुदा हो गए थे ,
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!
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काश कुछ ऐसा मंजर दिख जाए ,
आँख से निकले आंसू का क़तरा ,
पर ज़माने को समंदर दिख जाए !!
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कमबख्त ये ख्वाब भी बड़े अजीब होते हैं ,
उड़ जाती है नींद , फिर कहाँ लोग सोते हैं |
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घने हैं अँधेरे और अंधेरों का आकाश ,
न जाने कब जलेगी उजालों की लौ,
होते ही नहीं ख़त्म इंतज़ार के लम्हे ,
अब ऐसे में लिखें कविता क्यूँ !!
न जाने कब जलेगी उजालों की लौ,
होते ही नहीं ख़त्म इंतज़ार के लम्हे ,
अब ऐसे में लिखें कविता क्यूँ !!
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मन के कोने , हैं इतने उजले क्यूँ ,
फिर आया ख़्याल , इनमे बसे हो तुम!!
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शांति , प्रेम , सौहार्द और भाईचारा
,
बेमानी लगते हैं अब सारे ,
कोई तो दिन ऐसा आये , जब न बहे लहू ,
और मुस्कुराते मिले इंसान प्यारे !!
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न दंगाई मरता है , न बेईमान मरता है ,
न हिन्दू मरता है , न मुसलमान मरता है ,
मरता है अगर तो सिर्फ और सिर्फ इंसान मरता है !!
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जिंदगी के रंग
कभी धूशर , कभी चमकीले
कभी फीके , कभी गाढ़े
फिर भी इनके बिना , अधूरे हम ।
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बहुत देख ली मेहरबानियां तेरी ,
अब तो तेरी बेरुखी भी भाने लगी है !!
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धुआं तो निकल रहा था घर से लेकिन ,
चूल्हा नहीं जला था , ये और बात थी !!
चूल्हा नहीं जला था , ये और बात थी !!
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देखकर वहशियत इन इंसानों की ऐ ख़ुदा ,
तुझे अपने सृजन पे भी शर्म आ रही होगी !!
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निकले थे तलाश में एक सच्चे रिश्ते की,
पर हर जगह फरेब का बाजार मिल गया !!
पर हर जगह फरेब का बाजार मिल गया !!
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उंचाईओं को छूने की आदत नहीं रही ,
अब पैर जमीं पे ही रहें तो काफ़ी है !!
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कहीं न कहीं कोई वजह तो होती है ,
चेहरे यूँहीं उदास नहीं हुआ करते !!
चेहरे यूँहीं उदास नहीं हुआ करते !!
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