जीवन की निर्ममता से पाने छाँव चला जाए,
चलिए फिर आज अपने गाँव चला जाए !!
विकास की दौड़ में छूटे न मन का भोलापन,
बनावटी रिश्तों से दिल का भाव चला जाए !!
पुकार रही है वो सोंधी मिटटी की खुशबू ,
उस राह पर फिर से दबे पाँव चला जाए !!
चलिए फिर आज अपने गाँव चला जाए !!
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दौलत के ढेर में भी नहीं मिलती ,
जो शुकून माँ के आँचल में पायी है ,
उनके चेहरे पर चमक रही है खुशियां,
माँ आज फिर उनके सपनों में आई है !!
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काफिरों की बस्ती है जहाँ में हर तरफ ,
इन्सां होके जीना गंवारा नहीं इन्हें !!
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ये कापियों के पन्नों पर पड़े हुए दाग,
खून के बदले स्याही के भी हो सकते थे,
ये दीवारों पर पड़े खून के छीटें,
ये हमारी की हुई पेंटिंग्स भी हो सकती थीं,
ये खून में सने बस्ते,
इसपे मिक्की माउस का चित्र भी हो सकता था,
ये हमारी कक्षाओं में तड़तड़ाती हुई गोलिओं की आवाज,
क्यों नहीं हो सकता था कुछ सुन्दर , कुछ संगीतमय स्वर,
क्यों हमें दिखाया जा रहा है , सिखाया जा रहा है नफरत
करना,
हम क्यों नहीं सीख सकते मोहब्बत के पाठ,
आओ अब इन नफरतों की दीवार ढहा दें,
जहाँ में सबको प्यार करना सिखा दें,
एक दूसरे पे ऐतबार करना सिखा दें !!
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बहुत दूर तक जातीं हैं सदायें उनकी ,
कहते हैं कि बहुत टूट के प्यार किया था !!
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जिक्र जब भी चला वफ़ा का ज़माने में,
नाम उनका भी किसी जुबाँ पे नहीं आया !!
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वो हुनर कहाँ से लाऊँ , रिसते जख्मों में भी कैसे मुस्कुराऊँ ,
तजुर्बे तो बहुत मिले जिंदगी में , पर ख्वाबों को कहाँ ले जाऊँ !!
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इन दरख़्तों को देखा तो यकीं हुआ ,
जीवन गुजरते जाने का ही नाम है !!
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कैसा दस्तूर है ये हमारी जिंदगी का,
नफ़रतें सिखा जाती हैं प्रेम के अनोखे पाठ !!
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न जाने क्यूँ मिलता है इतना पोषण ,
कैसे फलता फूलता, नफरतों का कारोबार,
मिलती शिक्षा सबको यही , सिखाते सभी इसको,
बाटों इस जहाँ में , खुशियाँ , सुकून और प्यार !!!
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इंतजार करने की वजह न पूछो ,
कभी यहीं से गुजरे थे साथ साथ !!
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उम्र गुज़री पर समझा नहीं ये मुआमला ,
आज के दौर में वफ़ा के मायने क्या हैं !!
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ये ढलती हुई शाम ,
और जलती हुई बत्तियां ,
समझ नहीं पाता ,
किसके प्रतीक हैं ये ,
बढ़ते हुए अंधेरों के ,
या फैलते उजालों के !!
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समय का प्रभाव ,
कोई अछूता नहीं इससे ,
कहीं न कहीं हम हो जाते हैं बेबस ,
और फिर नहीं नज़र आता कोई द्वार ,
पर अपनी क्षमता पे हो अगर विश्वास ,
तो पा सकते हैं हम पार ,
मुश्किल नहीं हमारे लिए कठिन समय ,
बस जरुरत है तो सिर्फ भरोसे की ,
खुद पर , समय पर ,
क्यूंकि समय तो बदलता ही है ,
और हम भी बदलते हैं ,
बदलते समय के साथ !!
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फुरसत के कुछ पल,
जीवन की तमाम दुश्वारियाँ ,
रिश्तों के उलझे समीकरण ,
है यही इन सबका हल !!!!
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जब भी मिले , खोये खोये से मिले ,
होश में रहने का होश भी नहीं रहा !!
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कोशिशे हज़ार की ग़म को छुपाने की ,
कमबख्त मुस्कुराहट ही चुगली कर गयी !!
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क़दमों के निशाँ ढूंढते ढूंढते ,
निकल आये जिंदगी के जंगल में ,
क्या खबर थी कि पानी की एक लहर ,
जिंदगी के सारे निशाँ मिटा देगी !!
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बीज के गर्भ में छुपा है जीवन ,
जीवन जो कभी भी , कहीं भी ,
प्रस्फुटित हो जाता है ,
बस जरुरत होती है नमी की !
बीज को जरुरत नहीं है खेतों की ,
वो तो उग सकता है दीवालों पर ,
गमलों में , छतों पर ,
बस थोड़ी सी नमी और जीवन शुरू !
जिंदगी में भी शायद नमी की जरुरत है ,
और अगर नमी हो तो ,
उग जाता है बीज ,
हथेलियों में भी ,जिंदगी की तरह !!!
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जो हो हमें प्यारा , वो तुम्हें भी हो ये जरुरी तो नहीं,
अगर ये दस्तूर है तो इसे बदल दो,
क्योकि हर दस्तूर को निभाएं , ये भी जरुरी तो नहीं !!
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समझ नहीं पाता शिकायत रास्तों की ,
कुछ लोग तो सीधे दिल में उतर जाते हैं !!
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जब भी तुम साँझ ढलने की दुहाई देते हो ,
एक मुस्कुराते सूरज को बिदाई देते हो !!
वक़्त का क्या है , ये तो बदल जाता है ,
शायद यूँ अपने ग़म को रिहाई देते हो !!
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उगते सूरज की लालिमा ,
कितने ही दिलों को लुभाती है ,
अनगिनत कालजयी चित्रों में ,
ये क़ैद हो जाती है ,
पर कोई मेहनतकश ,
कहाँ समझता ये जज़्बात है ,
उसके लिए तो ये बस एक और ,
कठिन दिन की शुरुआत है ,
जिसमे वो फिर करेगा हाड़तोड़ मेहनत ,
ताकि जल सके उसका चूल्हा ,
बुझ सके उसके परिवार के पेट की आग ,
काश ये लालिमा उसे भी लगे लुभाने ,
औरों की तरह वो भी इसे देख लगे मुस्कुराने !!
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क्यों जाती हो अमीरों के घर बेहिसाब ,
माँ लक्ष्मी , कभी तो बदलो अपना रिवाज़ ||
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