Friday, February 27, 2015

हार के जीतना , गिर के उठना 
वक़्त सिखा ही देता है धीरे धीरे,
ये जिंदगी है कोई रंगमंच नहीं 
जहाँ पर्दा अपने हिसाब से गिरे !!
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मौत के साये में--
मौत के साये में पनपती है जिंदगी,
एक तरफ पनपता हुआ कल 
दूसरी तरफ गुज़रा हुआ पल,
साथ साथ हैं दोनों आज,
पर जीतती तो है हमेशा जिंदगी..

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जब भी हुआ दर्द , याद आया कोई दोस्त,
दुश्मनों ने तो अब , सताना ही छोड़ दिया !
चुभने लगे हैं पत्थर , अब तमाम राहों पे ,
उन गलिओं में अब , जाना ही छोड़ दिया !
कभी जो दिखते थे , हर दिन शामों सुबह, 
अब तो तसव्वुर में , आना ही छोड़ दिया !
वो भी शामिल थे , नफरतों के इस खेल में,
बेवजह उनको , अब मनाना ही छोड़ दिया !

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जब भी गिरते थे , लेती थी तुम सँभाल,
हम बच्चे ही रहेंगे , तुम्हारे आगे माँ !!

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